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सिर्फ रिद्धि-सिद्धि के दाता नहीं प्रबंधन के भी देवता हैं गणपति

गणपति सिर्फ रिद्धि-सिद्धि के दाता ही नहीं है, वे प्रबंधन का पौराणिक स्कूल भी हैं। गजशीश के साथ मानव देह से निर्मित गणपति की देह प्रबंधन के अध्याय हैं। फिर प्रबंधन क्या है? यह भी एक तरह से संबंध ही तो है। इसलिए गणपति को समझ लेने के बाद किसी भी दूसरी चीज को समझने की वैसी जरूरत नहीं रहती है।गणेश की विशालकाय काया में प्रबंधन के सारे सिद्धांत समाहित हैं। वे नॉलेज, साइंस और मैनेजमेंट के भी अधिष्ठाता कहे जा सकते हैं।गणपति का मस्तक हाथी का है। हाथी मूलत: शांत प्रवृत्ति का जीव है लेकिन बुद्धिमान भी है। वह अपने मस्तक में योजनाओं, विचारों को समाहित कर उन्हें क्रियान्वित करने में अपनी ऊर्जा लगाता है। गजपति का गजशीस भी यही प्रतीक लिए हुए हैं। समस्या या योजना के हर आयाम का ध्यान रखना, उन पर मनन करना और फिर उस अनुरूप क्रियान्वयन करना। गजपति का मस्तक हमें यही सिखाता है। इसी कारण वे प्रथम पूज्य माने गए हैं। सकारात्मकता का इससे बेहतर उदाहरण हो ही नहीं सकता।चूंकि उनका मस्तक हाथी का है इसलिए उनके कान भी हाथी के ही हैं। बहुत बड़े कान। ये इस बात का प्रतीक है कि उनमें सुनने की क्षमता अधिक हैं। वे हर छोटी-बड़ी बात सुनते हैं। जब आप दूसरों को सुनेंगे नहीं, उसके विचारों को जानेगें नहीं, तब तक आप सफल प्रबंधक हो ही नहीं सकते। दो सुपकर्ण का मतलब है कि एक पत्ता भी खड़के तो उसकी आवाज सुनाई दें। कहां, क्या हो रहा है यह प्रबंधक को पता होना चाहिए। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि जो सुन रहे हैं उन सब पर यकीन कर लिया जाएं। विश्वास करने के लिए फिर से उस विशाल मस्तक पर निर्भर रहते हैं जो मनन करता है।कम बोले, लेकिन मीठा बोलें। छोटा मुख भी इसी प्रतीक में प्रयुक्त होता है। उनकी वाणी सकारात्मकता का प्रतीक हैं। गणपति ने लोक-कल्याण की ही बात की है। संस्थान में यदि आप सकारात्मक रहेंगे तो सकारात्मक ऊर्जा का प्रलाह होगा और हर काम की सफलता के लिए सकारात्मकता का तत्व होने बहुत जरूरी है।सुंड, से यहां तात्पर्य है घ्राण-शक्ति। इसका संबंध सजगता से भी है। हर आसन्ना खतरे और हर बेहतर अवसर को पहले से समझ पाना यह भी प्रबंधन का सिद्धांत है। तभी तो आपको सुरक्षित सफलता मिलेगी। तो गणपति महज धार्मिक प्रतीक ही नहीं है, वे आधुनिक दौर में संबंधों और प्रबंधन के भी गहरे अर्थ खोलते हैं।

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